श्रीमङ्गलमूर्त्तये नमः
आदित्याद्या ग्रहासर्वे सनक्षत्राः सराशयः ॥
कुर्वन्तुमङ्गल तस्य यस्यैषा जन्मपत्रिका ॥
(शुद्ध सूर्य सिद्धान्त अनुसार)
| ग्रहाः | राशि (0-11) | राशि नं./अंश°कला'विकला" | नक्षत्र | नक्षत्रेश | बक्री/अस्त | ग्रह अवस्था |
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Astro Bishnu Poudel — शुद्ध सूर्य सिद्धान्त
| ग्रह | राशि | अंश | नक्षत्र | अवस्था |
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वार तथा तिथि अनुसार शुभ यात्रा, विवाह, गृहप्रवेश दिशा निर्णय
| वार | योगिनी | ग्रह | दिशा | ↗ | फल/विचार |
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शास्त्र अनुसार कुनै पनि शुभ कार्य वा विशेष यात्रामा निस्कनु अघि योगिनी र चन्द्रमाको स्थिति विचार गर्नु अत्यन्त फलदायी मानिन्छ। यात्रा सफल र सुखद बनाउन निम्न नियम पालना गर्नु शुभ हुन्छ।
योगिनीलाई जहिले पनि देब्रे (बायाँ) वा पछाडि (पृष्ठ) पारेर यात्रा सुरु गर्नु उत्तम हुन्छ। योगिनी अगाडि वा दायाँ हुनुलाई शुभ मानिँदैन।
योगिनी सुखदा बामे, पृष्ठे इच्छा दायनी ।
दाहिने धनहन्त्रि स्यात्, सन्मुखे मरणम् ध्रुवम् ॥
| योगिनीको स्थिति | फल |
|---|---|
| 🔵 बायाँ (देब्रे) | सुख दिने। |
| 🟢 पृष्ठ (पछाडि) | चिताएको इच्छा पूरा गर्ने। |
| 🟡 दायाँ (दाहिने) | धन हानि गराउने। |
| 🔴 सम्मुख (अगाडि) | कष्ट वा मृत्युतुल्य बाधा दिने। |
योगिनीको ठीक विपरीत, चन्द्रमालाई भने जहिले पनि अगाडि (सम्मुख) वा दायाँ (दाहिने) पारेर यात्रा गर्नुपर्छ।
| चन्द्रमाको स्थिति | फल |
|---|---|
| 🟢 अगाडि (सम्मुख) | अर्थ लाभ (धन प्राप्ति)। |
| 🟡 दाहिने (दायाँ) | सुख र सिद्धि। |
| 🔴 बायाँ वा पछाडि | कष्ट र धन हानि। |
🔑 सार: यात्रा सुरु गर्दा — योगिनी बायाँ/पछाडि र चन्द्रमा अगाडि/दायाँ पर्ने गरी प्रस्थान गर्नुलाई सर्वोत्तम शुभ मानिन्छ।
योगिनी दिशा विचार प्रमुखतः यात्रा, विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरम्भ, नयाँ कार्य शुरुवात आदि शुभ कार्यमा गरिन्छ। यात्रा वा कार्य प्रारम्भ गर्दा योगिनी कुन दिशामा छिन् भन्ने थाहा पाएर सोही अनुसार दिशा छनोट गर्नु आवश्यक मानिन्छ।
🛕 विशेष: शुभ कार्यमा योगिनी विचार सँगै चन्द्रमा विचार पनि मिलाएर हेर्दा फल अझै शुभ हुन्छ भन्ने परम्परागत शास्त्रीय मान्यता छ।
नेपाली परम्परा अनुसार थर र गोत्रको खोज एवं विवरण
गोचरभ्रमणवश सूर्यादिग्रहहरूको द्वादश स्थानहरूको फल-बोधक चक्र
| ग्रह भ्रमण स्थान |
सूर्य | चन्द्र | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | राहु | केतु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | स्थान-हानि, गमन | पुष्टि, अन्नलाभ | भय एवं पीडा | बन्धन, भय | अरिष्ट्यादि, भय | सुख, शत्रुनाश | सर्वनाश, पीडाभय | हानि-कष्ट, भय | हानि, रोगभय |
| २ | हानि, भय | धन-नाश, सुख | नेत्र-रोग, धनहानि | धनलाभ | धनलाभ | सुख, धनप्राप्ति | शोक, धनहानि | व्यय, निर्धनता | वैर, वित्तनाश |
| ३ | धनप्राप्ति, सुख | धनप्राप्ति, सुख | सुख, श्रीप्राप्ति | शत्रुभय | भय, रुग्णता | सुख, अर्थागम | सुख, अर्थलाभ | आरोग्य, धनप्राप्ति | सुख-लाभ, वृद्धि |
| ४ | रोगभय, मानहानि | रोग, मानार्थ-सिद्धि | शत्रु-भय, कष्ट | धन-सुखादि प्राप्ति | धनहानि, भय | धनागम | पीडा, भय, शत्रुवृद्धि | वैर, शोक | भय, पीडा |
| ५ | अर्थहानि, दीनता | सुख, कार्यहानि | रोगभय, धनक्षय | रोगभय, शोक | लाभ, सुख | सुख, पुत्रलाभ | धनहानि, पुत्रहानि | हानि, शोक | दुःख, धनक्षय |
| ६ | शत्रुनाश, सुख | वित्तलाभ | सुख, धनलाभ | अलाभको स्थिति | रोग, शोक | शत्रुभय, पीडा | सुख, धनलाभ | सुख, लक्ष्मीप्राप्ति | सुख, धनलाभ |
| ७ | अर्थक्षति, गमन | द्रव्यप्राप्ति, सुख | कृशता, धनहानि | पीडा, भय, विग्रह | सन्मान, सुख | शोक, अतिभय | दोष, पीडा, भय | दरिद्रता, हानि | दुर्गति, कष्ट |
| ८ | रुग्णता, भय | क्लेशभय, अपमृत्यु | भय, पापबुद्धि | धन आदिको लाभ | मृत्युभय, पीडा | विपत्ति, धनक्षय | पीडा, भय, शत्रुवृद्धि | रोगभय, व्यसन | पीडा, भय, हानि |
| ९ | कान्तिक्षय, पापबुद्धि | मान, राजभय | रोगभय, वैकल्य | रोगभय, धनक्षय | सुख, सन्मान | सुखलाभ | पाप, धननाश | पापकर्मसक्ति | पाप, दीनता |
| १० | सौख्य, कर्मसिद्धि | शुभ, सुख | सुख, शोक | सुख, सुभोग | अतिदीनता | धर्मलाभ, सुखरहित | वैमनस्य, वैकल्य | वैर, सुख | भय, शोक |
| ११ | धनप्राप्ति, सुख | विविध प्रकार धनलाभ | लाभ, सुखप्राप्ति | शुभ, अर्थागम | सुख, वित्तलाभ | दुःख, धनागम | सुख, धनलाभ | सुख, वृत्तिप्राप्ति | सुयश- अर्थलाभ |
| १२ | धनक्षय, पीडा, भय | रोग, धनहानि | रोग, शोक | शोक, धनक्षय | भय, देहपीडा | धनागम | क्लेश, अनर्थ | हानि, पीडा | पीडा, भय, वैर |